Heritage play YAKSHINI at IGNCA, New Delhi

अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के अवसर पर नाटक यक्षिणी का इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र नई दिल्ली में मंचन

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India’s first play based on archaeological artifact YAKSHINI was staged at IGNCA New Delhi on the occasion of INTERNATIONAL MUSEUM DAY, May 18, 2019.

Sunita Bharti with Dr. Daya Prakash Sinha
Felicitation of Sunita Bharti after the show of YAKSHINI at IGCNA by Dr. D. P. Sinha, trustee and executive, IGCNA, New Delhi.
Sunita Bharti with Supriya Consul
Sunita Bharti shared stage with Ms Supriya Consul, Programme Director, Kaladarshan, IGNCA, New Delhi.

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Sunita Bharti : Felicitation at IGNCA
The director of play YAKSHINI & the heritage play series : Sunita Bharti

नाटकों में नित नए प्रयोग होते रहते हैं, किन्तु नाटकों का प्रयोग गैर-परंपरागत विधा में एक विरल घटना है। सुनिता भारती ने पहली बार इस देश में विरासतों को जन मानस तक लाने के लिए रंगमंच का प्रयोग किया है।

हेरिटेज-प्ले नामक नाटक श्रृंखला के माध्यम से सुनीता भारती ने पहली बार ‘सार्वजनिक संग्रहालय विज्ञान’ जैसे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में रंगमंच का रचनात्मक उपयोग किया है, जो केंद्र और राज्य सरकारों के विरासत संरक्षण अभियान का एक महत्वपूर्ण उपष्कर साबित होने के साथ ही TiE (Theatre in Education) को उसके प्रयोगात्मक शैशव काल से निकाल कर एक उपयोगी विधा के रूप में स्थापित करता है।

Jyotsna Sharma
Jyotsna Sharma Introducing the play YAKSHINI at IGNCA on International Museum Day (18 May 2019)

इस नाटक श्रृंखला का पहला नाटक है यक्षिणी जो विश्व-प्रसिद्द मौर्य कालीन कलाकृति ‘दीदारगंज चामर-धारिणी’ पर आधारित है। इस नाटक में इस भव्य कलाकृति के प्राप्त होने की कहानी और इससे सम्बंधित सभी शोधात्मक तथ्यों को मनोरंजनात्मक कथा के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो जन मानस में इस कलाकृति को सदा के लिए जीवंत बना देता है। यही कारण है कि भारत सरकार की कला-संस्कृति-विज्ञान-समन्वयक अध्ययन और शोध संस्थान, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (Indira Gandhi National Centre for the Arts, IGNCA), नई दिल्ली द्वारा, अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस (International Museum Day, 18 मई, 2019) के अवसर पर श्रीमती भारती द्वारा निर्देशित और भारत में किसी पुरातात्विक कलाकृति पर केन्द्रित प्रथम नाटक यक्षिणी का मंचन किया गया। इस मंचन के बाद नाटक यक्षिणी को उच्च शिक्षा (सार्वजनिक संग्रहालय विज्ञान) के क्षेत्र में प्रथम अकादमिक नाटक होने का गौरव प्राप्त हुआ है और पटना रंगमंच की प्रतिष्ठा बढ़ी है। इस नाटक का लेखन अरविन्द कुमार ने किया है तथा ऐतिहासिक तथ्यों का संकलन डॉ. शंकर सुमन ने किया है, जो पटना संग्रहालय के संग्रहालयाध्यक्ष हैं।

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Yakshini artists and director with FACES-executive Jyotsna Shanrma (Deputy General Manager, Samsung Electronics) and Ravi Kumar, Co-Founder & CTO RupeeGO

नाटक की युवा निर्देशिका सुनिता भारती ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा में एम० ए० (नाट्यशास्त्र) की विद्यार्थी हैं। इन्होने बताया कि नाटक उनके लिए करियर नहीं बल्कि शौक और साधना है। रंगमंच की दुनिया में आने के बाद से ही सुनिता भारती परंपरा से हट कर नाटकों के कुछ ठोस उपयोग पर विचार करती रही हैं, जो अंततः यक्षिणी के माध्यम से शैक्षणिक नाटकों की श्रृंखला के रूप में फलीभूत हुई। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र द्वारा यक्षिणी नाटक का अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के अवसर पर प्रदर्शन के लिए चुना जाना इनके रचनात्मक विचारों की प्रमाणिकता को सिद्ध करता है। इनका कहना है कि यक्षिणी की सफलता उनकी व्यक्तिगत सफलता नहीं बल्कि उनके टीम, लेखक और शोधकर्ता की सामूहिक सफलता है, और दरअसल यह पटना रंगमंच की सफलता है। विरासत संरक्षण और शिक्षण के लिए नाटक के प्रयोग के पीछे वे यूनानी दार्शनिक सिसरो (पहली सदी ईसा पूर्व) के कथन को अपनी प्रेरणा मानती हैं, जिसमें उसने कहा है कि “जो आदमी अपने अतीत से परिचित नहीं वह आजन्म शिशु है”।

प्रसिद्द कला इतिहासकार डॉ. चितरंजन प्रसाद सिन्हा (पूर्व निदेशक, कासी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान) के अनुसार विरासतों के संरक्षण का इससे अधिक प्रभावशाली और कोई उपाय नहीं कि आम जनता के ह्रदय में उन्हें स्थापित कर दिया जाय। हम अपने विरासतों को जितना अधिक जानते है, उतना ही अधिक उनसे प्रेम करते हैं, और उनका वास्तविक मूल्य और महत्व को समझ कर उनकी सुरक्षा की परवाह करते हैं। हेरिटेज प्ले श्रृंखला के नाटकों के माध्यम से सुनिता भारती यही कर रहीं हैं। उन्होंने नाटकों के प्रचलित विषय (समसामयिक समस्या, ऐतिहासिक-पौराणिक घटनाओं और राजनैतिक समस्या इत्यादि) से अलग, पुरातात्विक विरासतों से सम्बंधित तथ्यों को नाटक का विषय वस्तु बनाया है। उनके इस प्रयोग से रंगमंच का एक नया उपयोगी स्वरुप उभर कर सामने आया है। हम अगर एक पुरावशेष की कहानी दर्शकों को दिखाते हैं, तो दुसरे पुरावशेषों के प्रति सहज ही उसके मन में जिज्ञासा उठेगी और वे विरासतों को ज्यादा से जयादा जानने की कोशिश करेंगे। इस प्रकार की जागृति विरासत संरक्षण में आने वाली कई दिक्कतों को दूर करेगा।

प्रसिद्द इतिहासविद डॉ. उमेशचंद्र द्विवेदी (पूर्व निदेशक, संग्रहालय, बिहार) ने बताया कि संग्रहालय विज्ञान के पाठ्यक्रम में एक विषय होता है, सार्वजनिक संग्रहालय विज्ञान जिसमें हम छात्रों को यह पढ़ाते हैं कि संग्रहालयों के पुरावशेषों को किस प्रकार जनता तक ले जाना है? इसमें दृश्य-श्रव्य माध्यमों से संग्रहालय संकलन के बारे में जन-साधारण को शिक्षित करने की तकनीक पढ़ायी जाती है। इस सन्दर्भ में नाटक यक्षिणी एक बहुत ही सुन्दर उदहारण है, जिसमें जनता को नाटक के माध्यम से पुरावशेषों से सम्बंधित तथ्यों को बताया गया है। निश्चय ही नाटक में देखी गई बातें अन्य माध्यमों की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली हुआ करती हैं।

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Gunjan Kumar (the co-protagonist of play YAKSHINI) was felicitated by Dr. D. P. Sharma at IGNCA

पटना संग्रहालय के अपर निदेशक डॉ. विमल तिवारी, संग्रहालयाध्यक्ष डॉ. शंकर सुमन, बुद्ध-स्मृति संग्रहालय के डॉ. नीतू तिवारी एवं गंगा देवी महिला महाविद्यालय के प्रोफ़ेसर और लेखिका डॉ. किरण कुमारी यक्षिणी नाटक को एक अत्यंत उपयोगी नाट्य परंपरा का शुरुआत मानते हैं। इन विद्वानों के अनुसार पुरातात्विक धरोहर पुराविदों की प्रतिभा और श्रम-साधना के परिणाम हुआ करते हैं जिनके आधार पर इतिहासकार अतीत की अज्ञात कड़ियों को जोड़ कर एक सतत इतिहास का निर्माण करते हैं। किन्तु ये संग्रहालयों के चहारदीवारी के भीतर सीमित रह कर एक अल्पसंख्य प्रबुद्ध समुदाय के मानस को ही प्रभावित कर पाते हैं, जन-मानस को तरंगित नहीं कर पाते। सुनिता भारती ने नाटक यक्षिणी (और इसके बाद आने वाले नाटकों) के माध्यम से इतिहास और पुरातत्व को संग्रहालयों की चाहरदीवारी के बाहर, समाज के हर कोने में पहुंचाने का काम किया है, जो स्तुत्य है।

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Dr. Shankar Suman, Dr. Neetu Tiwari, Dr. Kiran Kumari, Dr. C. P. Sinha, Dr. U. C. Dwivedi and others with artists and director of the play Yakshini at press-conference.

हेरिटेज प्ले श्रृंखला के लेखक अरविन्द कुमार ने आगामी नाटक अस्थि-कलश के बताते हुए कहा कि यह नाटक 1956 में वैशाली से प्राप्त महात्मा बुद्ध के अवशेष पर आधारित होगा और इस नाटक के माध्यम से पुरातत्व विज्ञान की सामान्य जानकारी दर्शकों को प्राप्त होगी।

नाटकों की प्रस्तुति फेसेस, संस्था द्वारा किया जाता है तथा इन नाटकों की तैयारी और प्रदर्शन में बिहार पुराविद परिषद् सहयोग करती है।

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Images of the show at IGNCA 

Introduction & Objective

The outcome of dedicated labour and talent of our archaeologists and historians in reconstructing our past must not be confined within the circle of intellectual minority, but must reach every nook and corner of society. Therefore, the existence of archaeological artefacts and finds must transcend beyond the walls of the museums and resonate in the conscience of common people. If it so happens, our heritage shall be preserved in the hearts of the people, beyond the confines of museums and historical sites.

With this very objective, Mrs. Sunita Bharti, the young theatre personality from Patna, has started the Heritage Series of Plays; the first production being Yakshini, based on the Mauryan sculpture Didarganj Chawry Bearer Female Figure and the upcoming one is Ashthi Kalash, based on the excavation of the relics of Buddha at Vaishali.

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Makeup artist Anju Kumari of team Yakshini

She believes that message and information delivered through plays have deeper impact on public conscience compared to those conveyed through cinema and videos. Therefore, Mrs. Bharti has chosen her discipline, the theatre, to make people aware of the museum-collections by virtually taking them directly to the people, showcasing the stories of their excavation and related information. Through the stage shows of Yakshini at Patna, she has proved that people are drawn towards the museums with enhanced interest in antiquities; their eyes searching for another artefact having another story hidden within. This is a fact that more we know about antiquities, more we respect them and more are we keen for their conservation.

We know that the role of museums is not limited to collecting and conserving things, but also to educate people about them. In this regard, Yakshini is the first theatrical piece accountable in the subject of Public Museology. Staging of such plays in public is very much relevant and beneficial on the occasions like World Heritage Day, International Museum Day, International Archaeology Day, Museum Week and others.

The Story

First part of the play Yakshini describes the documented story of accidental excavation of Didarganj Yakshini by the villagers of Didarganj, Patna (Bihar) on October 18, 1917, followed by its retrieval in to the newly built Patna Museum through a well woven entertaining story in which most of the characters like Prof. Jogindar Nath Samadar, E. H. C. Walsh, Dr. D. B. Spooner and Ghulam Rasul are real.

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Director Sunita Bharti with Dr. Sanjeev Kumar Singh, Director, Publication, National Museum New Delhi and Programme Director, Kaladarshan, IGNCA Ms Supriya Consul after the show.

Documents like acquisition paper of Patna Museum, confidential report of inspector of Malsalami Thana, Patna and the report of Dr. D. B. Spooner in the Journal of Bihar and Orissa Research Society, 1919, mention the involvement of a student of Prof. Samadar of Patna College, a washer-woman and some villagers of Tajpur-Rasulpur of Didarganj, but they are people with unknown identity. The writer has taken the liberty to call them by imaginary names in the story.

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A scene from Yakshini fabricated in 3rd century BCE

The story is not a mere repetition of the events in 1917 but gives all the information related to this icon as explicitly as described by a museum guide. The play presents the opinions and conclusions about the time, aesthetic values, objective of sculpting and other attributes, given so far, by eminent workers, scholars and archaeologists. Through this story creators of the play have pointed out the elements of uniqueness in this figure, viz., the depiction of its smile responding according to the viewer’s own emotion. They are of the opinion that a scientific study of this art may reveal new features adding to the glory of this magnificent legendary icon. Moreover, this play highlights the cult-value of the sculpture in popular tradition and belief.

Part 2 of this play is an imaginary story depicting the circumstances leading to sculpting of this figure in third century BC. The story gives an idea of ancient Pataliputra and emphasizes that the city was also the manufacturing centre of Mauryan polished stone sculptures. But the main objective of fabrication of this story is to make Mauryan Era, to which the sculpture belongs, perceivable to the public, so as to attach the audiences with this figure emotionally, without harming the established facts related to the latter.

Details

Director: Sunita Bharti

Writer: Arvind Kumar

Research: Dr. Shankar Suman, Curator, Patna Museum, Patna.

Artists

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